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भारत में हीटवेव की दस्तक: क्या जलवायु परिवर्तन है वजह?

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भारत में हीटवेव की दस्तक: क्या जलवायु परिवर्तन है वजह?

जैसे ही अप्रैल का पहला हफ्ता शुरू हुआ, गर्मी ने अपना असली रूप दिखाना शुरू कर दिया। भारत में तापमान तेजी से बढ़ रहा है और लोगों को इस बढ़ती गर्मी से भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने चेतावनी दी है कि इस बार अप्रैल से जून के बीच सामान्य से कहीं अधिक गर्मी पड़ने की संभावना है। सवाल उठता है कि क्या यह सिर्फ एक मौसमी बदलाव है या फिर जलवायु परिवर्तन की गंभीर चेतावनी?

उत्तर भारत में तेज गर्मी और हीटवेव की आशंका

उत्तर भारत में इस बार गर्मी ने पहले से ही दस्तक दे दी है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों में तापमान 38 से 40 डिग्री सेल्सियस के बीच दर्ज किया गया है। मौसम विभाग का कहना है कि मई और जून में उत्तर-पश्चिम भारत और मध्य भारत में 10 से 12 दिनों तक हीटवेव का दौर चल सकता है। इन दिनों में तापमान 44 डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर जा सकता है।

दिल्ली और आसपास के इलाकों में लोग अभी से धूप से बचने के लिए छाते लेकर चल रहे हैं और पानी की बोतल हमेशा साथ रख रहे हैं। बच्चों और बुजुर्गों को विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी जा रही है।

दक्षिण भारत में मौसम थोड़ा राहत भरा, लेकिन सतर्कता जरूरी

दक्षिण भारत में स्थिति थोड़ी अलग है। कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कुछ इलाकों में तापमान 35 से 38 डिग्री के बीच बना हुआ है। हालांकि केरल और दक्षिणी कर्नाटक में हाल ही में हुई हल्की से मध्यम बारिश ने कुछ राहत जरूर दी है। IMD ने यह भी कहा है कि इन इलाकों में तेज हवाओं के साथ ओलावृष्टि की संभावना है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि गर्मी खत्म हो गई है — स्थिति कभी भी बदल सकती है।

मई और जून में स्थिति और खराब हो सकती है

अप्रैल की शुरुआत में ही जब गर्मी लोगों को झुलसाने लगी है तो मई और जून में स्थिति और गंभीर हो सकती है। मौसम विभाग का आकलन है कि इस साल तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। खासकर उत्तर भारत में हालात ज्यादा चिंताजनक हो सकते हैं।

हीटवेव के दिनों की संख्या बढ़ने से लोगों की सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है। सिरदर्द, चक्कर आना, डीहाइड्रेशन और लू लगने जैसे खतरे कहीं अधिक बढ़ जाएंगे। स्कूल, ऑफिस और बाहर निकलने वाले कामों में भी मुश्किलें आएंगी। इसलिए समय रहते जरूरी उपाय अपनाना बेहद जरूरी है।

क्या यह सब जलवायु परिवर्तन का नतीजा है?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति केवल एक मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रभाव है। बीते कुछ दशकों में मनुष्य ने प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया है। जंगलों की कटाई, तेजी से बढ़ता शहरीकरण और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन — इन सबने मिलकर वातावरण को गर्म बना दिया है।

कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी गैसें वातावरण में गर्मी को फंसा लेती हैं जिससे वैश्विक तापमान लगातार बढ़ रहा है। भारत जैसे देश, जहां पहले से ही गर्म मौसम होता है, इन परिवर्तनों से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।

गर्मी पहले क्यों पड़ रही है इस बार?

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इस साल गर्मी जल्दी शुरू होने के पीछे कई वजहें हैं। मौसम के पैटर्न में बदलाव, एल नीनो प्रभाव और समुद्री सतह के तापमान में बढ़ोतरी जैसे कारकों ने मिलकर गर्म हवाओं का प्रवाह पहले शुरू कर दिया है।

शहरीकरण और कंक्रीट की बढ़ती संरचनाएं भी स्थानीय तापमान को तेजी से बढ़ा रही हैं। इन सबका असर यह हो रहा है कि जहां पहले मई-जून में गर्मी अपने चरम पर होती थी, अब वह दौर अप्रैल में ही देखने को मिल रहा है।

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