केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में एक सवाल उठाया जो हर भारतीय के मन में गूंज सकता है—भारत में इनोवेशन की कमी क्यों है? क्या हमारा देश सचमुच सिर्फ डिलीवरी बॉय और गर्ल बनकर संतुष्ट हो गया है, या फिर इसके पीछे कुछ गहरे कारण हैं? यह सवाल न केवल हमारी सोच को चुनौती देता है, बल्कि यह भी बताता है कि हमें अपनी क्षमताओं को नए सिरे से देखने की जरूरत है। आज जब दुनिया टेक्नोलॉजी और क्रिएटिविटी की ऊंचाइयों को छू रही है, भारत जैसे विशाल और प्रतिभाशाली देश के लिए यह विचारणीय है कि हम कहां खड़े हैं।
इनोवेशन का मतलब सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं
पीयूष गोयल का यह बयान केवल एक आलोचना नहीं, बल्कि एक आह्वान है। इनोवेशन का मतलब सिर्फ बड़े-बड़े स्टार्टअप या तकनीकी आविष्कार नहीं है। यह हमारे रोजमर्रा के जीवन में नए तरीके खोजने, समस्याओं का हल निकालने और समाज को बेहतर बनाने की सोच से भी जुड़ा है। लेकिन क्या हमारी युवा पीढ़ी इस दिशा में सोच रही है? या फिर हम तेजी से बढ़ती ई-कॉमर्स और डिलीवरी संस्कृति में उलझकर रह गए हैं? गोयल का कहना है कि हमें अपनी सोच को बदलना होगा, ताकि हम नौकरी मांगने वालों से नौकरी देने वाले बन सकें।
क्या है असली चुनौती?
भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। हर साल लाखों इंजीनियर, डॉक्टर और वैज्ञानिक तैयार होते हैं। फिर भी, इनोवेशन के मामले में हम पीछे क्यों हैं? विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे शिक्षा व्यवस्था, जोखिम लेने की कमी और सरकारी नीतियों में सुधार की जरूरत जैसे कारण हो सकते हैं। जहां दुनिया के बड़े देश अपने युवाओं को रिसर्च और डेवलपमेंट में प्रोत्साहित करते हैं, वहीं भारत में ज्यादातर लोग सुरक्षित नौकरी की तलाश में रहते हैं। गोयल का यह सवाल हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी प्राथमिकताएं बदलने का वक्त आ गया है?
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