चार दिनों की जीवन लीला ,भिन्न भिन्न हैं राग अभय ।
कभी पूस की ठंड यहां पर ,कभी बसंती फाग अभय ।।
कलियों से जो फूल बने वो ,क्यों खिलकर मुरझाते हैं ।
पैदा हुए जवान हुए हम ,बूढ़े हो मर जाते हैं ।।
रूप राशि पर गर्व करें क्यों , जीवन सबका नश्वर है ,
नियत समय जाना है सबको ,बैठा रह या भाग अभय ।।
चार दिनों की जीवन लीला , भिन्न भिन्न हैं राग अभय ।।1
कौन यहां सुलझा पाया है, जीवन एक पहेली है ।
योद्धा , ज्ञानी ,या संन्यासी ,सबकी मौत सहेली है ।।
सांसों का यह अंकगणित है ,क्यों अमरत्व खोजता है ,
पंच तत्व की देह खिलौना , राख बनाए आग अभय ।।
चार दिनों की जीवन लीला ,भिन्न भिन्न हैं राग अभय ।।2
सपनो का ये विश्व समूचा,मृत्यु लोक कहलाता है ।
स्वर्ग नर्क सारे धरती पर ,वेद हमें बतलाता है ।।
जन्नत के झांसे में हमको , ठगते हैं कुछ लोग यहां ,
सत्य सनातन की डालों पर ,लिपटे हैं कुछ नाग अभय ।।
चार दिनों की जीवन लीला ,भिन्न भिन्न हैं राग अभय ।।3
कौन यहां मंदिर बनवाया ,कौन बनाया लाल किला ।
जिसने जितना कर्म किया है ,उतना उसको नाम मिला ।।
जीवन लीला के उपक्रम का ,निश्चित है लेखा जोखा ,
सदा हरा किसका रह पाया , जीवन रूपी बाग अभय ।।
चार दिनों की जीवन लीला ,भिन्न भिन्न हैं राग अभय ।।4
नदी सरीखा जीवन जीवें, सागर सा ठहराव रखें ।
अपने किए सभी कर्मों का ,खाता और हिसाब रखें ।।
चकाचौंध की परछाई के , अंतस में अंधियारा है ,
उज्वल रखो चदरिया अपनी , लगे न कोई दाग अभय ।।
चार दिनों की जीवन लीला ,भिन्न भिन्न हैं राग अभय ।।5
जीवन एक नाटिका मानो ,अभिनय तो करना होगा ।
सब पर लटकी छड़ी काल की ,एक दिवस मरना होगा ।।
"हलधर" के कविता लेखन को,दर्शन मानो या अनुभव ,
कविता में अमरत्व सो रहा ,जाग सके तो जाग अभय ।।
चार दिनों की जीवन लीला ,भिन्न भिन्न हैं राग अभय ।।6
- जसवीर सिंह हलधर , देहरादून
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